गुरुवार, 23 अप्रैल 2015
मंगलवार, 21 अप्रैल 2015
मुंडकोपनिषद
मुंडकोपनिषद:
सत्यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिए गए हैं, जिसका अर्थ है केवल सच्चाई की विजय होती है। श्रीमद् भागवत में व्यास जी ने कही है। माया के दो रूप है। एक वह माया जो ब्रह्म इसलिए गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं :— मुंडकोपनिषद में इस विषय में विस्तृत चर्चा शकराचार्य जी ने की है। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
ॐ श्री परमात्मने नमः
शान्ति पाठ
हे देव गण !कल्याण मय हम वचन कानों से सुनें,
कल्याण ही नेत्रों से देखें, सुदृढ़ अंग बली बनें।
आराधना स्तुति प्रभो की हम सदा करते रहें,
मम आयु देवों के काम आए, हम नमन करते रहें।
हे इन्द्र !मम कल्याण को , कल्याण का पोषण करें,
हे विश्व वेदाः पूषा श्रीमय ज्ञान संवर्धन करें।
हे बृहस्पति ! अरिष्ट नेमिः स्वस्ति कारक आप हैं,
सब त्रिविध ताप हों शांत जग के, देते जो संताप हैं।
रक्षक रचयिता जगत का अति आदि ब्रह्मा अति महे,
ब्रह्मा स्वयं भू देवताओं में प्रथम अति दिव्य हे !
स्व ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को, ब्रह्मा ने उपदिष्ट की,
शुचिमूल भूता ब्रह्म विद्या, ब्रह्मा ने निर्दिष्ट की॥ [ १ ]
श्री ब्रह्मा ने जिस ब्रह्म विद्या को अथर्वा से कहा,
उसे अंगी ऋषि से अथर्वा ने पूर्व उससे भी कहा।
उन अंगी ऋषि ने भारद्वाजी सत्य वह ऋषि को कहा,
पूर्ववत अथ पूर्ववत अथ पूर्ववत का क्रम रहा॥ [ २ ]
विख्यात कि शौनक मुनि, ऋषि कुल अधिष्ठाता जो थे,
ऋषि अंगीरा के पास आए , प्राण कुछ मन को मथे।
अति विनत हो पूछा कि भगवन , तत्व कौन सा है महे?
जिसे जान कर हो विज्ञ सब कुछ, तत्व वह कृपया कहें॥ [ ३ ]
अथ ब्रह्म ज्ञाता दृढ़ता से, निश्चय से कहते सार हैं,
ये परा अपरा दो ही विद्याएँ हैं ज्ञान अपार है।
मानव को ये ही ज्ञान दो, जो श्रेय और ज्ञातव्य हैं,
,शौनक मुनि से अंगिरा ऋषि ने कहा श्रोतव्य हैं॥ [ ४ ]
उन दोनों में से साम यजुः ऋग अथर्व अपरा वेद हैं,
छंद , ज्योतिष, व्याकरण, व् निरुक्त वेद के भेद हैं।
वह परा विद्या वेद की, जिससे कि ब्रह्म का ज्ञान हो,
वेदांगों वेदों के ज्ञान से , मानव महिम हो महान हो॥ [ ५ ]
ज्ञान इन्द्रिय, कर्म इन्द्रिय, आकृति विहीन जो नित्य है,
अनुपम अग्रहायम विभु अगोत्रम है अदृश्य अचिन्त्य है।
प्रभु सर्वव्यापी सूक्ष्म अतिशय ब्रह्म अविनाशी महे,
सब प्राणियों के परम कारण, पूर्ण प्रभु ज्ञानी कहे॥ [ ६ ]
ज्यों मकडी जले को बनाती और स्वयं ही निगलती ,
ज्यों विविध औषधियों धरा से , पुष्टि पाकर निकलतीं।
ज्यों प्राणियों के देह से रोयें व् कच उत्पन्न हो,
त्यों ब्रह्म निष्कामी से सृष्टि में ही सब निष्पन्न हो॥ [ ७ ]
संकल्प तप से सृष्टि काले, ब्रह्म सृष्टि को रचे,
फ़िर सूक्ष्म से स्थूल अथ सृष्टि की सरंचना रुचे।
अथ अन्न से उत्पन्न प्राण हो, प्राण से मन सत्य भी,
फ़िर लोक कर्म व् कर्म फल सुख दुःख रूप के कृत्य भी॥ [ ८ ]
इस सकल सृष्टि के आदि कारण, ब्रह्म तो सर्वज्ञ हैं,
सर्व ज्ञाता विश्व पोषक, ब्रह्म को सब विज्ञ है।
पर ब्रह्म का तप ज्ञान मय , जिससे वह रचता सृष्टि है,
सब नाम रूप व् अन्न जग के, विराट की एक दृष्टि है॥ [ ९ ]
प्रथम मुण्डक / द्वितीय खण्ड / मुण्डकोपनिषद / मृदुल कीर्ति
वेदों के मंत्रो में था देखा, ऋषियों ने जिन कर्मों को,
ऋग, साम, यजुः, में, व्याप्त जो, जीवन के सात्विक धर्मों को।
इन नियमों का हे सत्य प्रिय ! तुम आचरण नियमित करो।
शुभ कर्म फल का मार्ग यह, जग की विषमता से तरो॥ [ १ ]
जब प्रज्ज्वलित होवे हविष्या, अग्नि की ज्वाला अति,
तब ही डालें प्रज्ज्वलित अग्नि के मध्य में आहुति।
भाज्य भाग की दोनों आहुतियों का स्थल छोड़कर,
मध्य अग्नि प्रचंड हो,तुब डालें आहुति ॐ कर॥ [ २ ]
जो चातुर्यमासव् पूर्ण मासी, अमावस्या की दृष्टि से।
ऋतु बसंत शरद के नूतन अन्न आहुति दृष्टि से।
हैं रहित यज्ञ व् अतिथि आदर भी न जिनको प्रेय है।
उस अग्नि होत्री के पुण्य क्षीण न यज्ञ वृति भी श्रेय है॥ [ ३ ]
काली कराली अग्नि चंचल, उग्र अति सुलोहिता,
चिंगारी मय सुध्रूम वर्णा, दीप्तिमय मन मोहिता।
ये विश्व रूचि स्फुलिंग्नी, जिव्हाएं अग्नि की सप्त हैं
ग्राह्य आहुति जबकि अग्नि, लपलपाती तप्त हैं॥ [ ४ ]
जो अग्निहोत्री कोई भी, इन दीप्तिमय ज्वालाओं में,
करे अग्निहोत्र को यथाकाले, शास्त्र विधि की विधाओं में।
उसकी ही आहुतियाँ रवि की रश्मियों के रूप में,
हैं मरण काले साथ जातीं, देव लोक अनूप में॥ [ ५ ]
ऋत अग्निहोत्री की मरण काले, दी हुई आहुति सभी,
शुभ स्वस्तिमय साधक को बन, साधन भी बन जातीं तभी।
रवि रश्मियों के मार्ग से, जा ब्रह्म को वे पा सकें,
शुभ पुण्य कर्मों से ब्रह्म लोक की वाणी को अपना सकें॥ [ ६ ]
शुभ साधना से हीन यज्ञ व् कर्म जो भी सकाम हैं,
वे हीन श्रेणी के कर्म मूढ़ को, लगते फ़िर भी प्रधान हैं।
इनको परम सुख श्रेय प्रेय व मुक्ति का मग मानते,
पुनि -पुनि वे ही मृत्यु ज़रा को भोगते व् जानते॥ [ ७ ]
मिथ्याभिमानी मूढ़, ज्ञानी, स्वयं को जो मानते,
अतिमूढ़ अज्ञानी, नहीं वे ब्रह्म को हैं जानते।
ज्यों अंधे को अंधा दिखाये, मार्ग पर मिलता नहीं,
त्यों मूढ़ पुनि- पुनि जन्मता, मरता है पर तरता नहीं॥ [ ८ ]
जो भी अविद्या मग्न हैं,वे सब सकामी मूढ़ हैं,
कल्याण पथ से अबोध हैं वे, तत्व ब्रह्म के गूढ़ हैं।
जो भोगों में आसक्त वे क्या जानें परमानन्द को,
पुनि क्षीण होते पुण्य तब, आतुर हों ब्रह्मानंद को॥ [ ९ ]
अज्ञानी अति जो सकाम कर्मों को, श्रेष्ठ माने, श्रेय को।
नहीं जानते व् निमग्न हैं, पाने को भोग को प्रेय को।
जब पुण्य उनके क्षीण हों, तो लेते पुनि- पुनि जन्म हैं,
वे जन्म लेते मनुज लोके या मनुज से भी निम्नं हैं॥ [ १० ]
कोई ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, गृहस्थ्य या संन्यासी हो,
यदि तम, रजोगुण हीन हों, रवि लोक के वे वासी हों।
जहाँ जन्म मृत्यु विहीन शाश्वत, नित्य अविनाशी रहे,
विभु पूर्ण पुरुषोत्तम जनार्दन, सत्य अति अद्भुत महे॥ [ ११ ]
नहीं ब्रह्म मिलता कदापि उसको, कर्म जिसके सकाम हों
स्पष्ट नित्य अनित्य जिसको, वृति भी निष्काम हो।
जिज्ञासु वे जन, हाथ में समिधा को लेकर विनत हों,
जाएँ गुरु के पास, वेदों का मर्म जानें, प्रणत हों॥ [ १२ ]
मन बुद्धि, इन्द्रियों पर नियंत्रण, शांत जिसका चित्त हो,
यम् शम दम आदि युक्त हो, जग से विरागी वृति हो।
एसे ही शरणागत विवेकी, शिष्य को गुरु ज्ञान का
जब तत्व विधिवत ऋत कहे, तब नाश हो अज्ञान-का॥ [ १३ ]
द्वितीय मुण्डक / प्रथम खण्ड / मुण्डकोपनिषद / मृदुल कीर्ति
ज्यों प्रज्ज्वलित अग्नि से निःसृत, सैकडों चिंगारियां,
सम रूप की उद्भूत हों, व् विलीन हो जाएँ वहाँ।
त्यों शिष्य प्रिय यह सृष्टि भी, अविनाशी से उद्भूत है,
और उसी में विलीन होकर, रूप इनके प्रभूत हैं॥ [ १ ]
वह पूर्ण पुरुषोत्तम अजन्मा, दिव्य अनुपम पूर्ण है,
है प्राण मन से विहीन विभु, अमूर्त है, सम्पूर्ण है।
आकार हीन विशुद्ध व्यापक, सकल सृष्टि में व्याप्त है।
संसार में सब कुछ यहॉं, उसकी कृपा से ही प्राप्त है॥ [ २ ]
मन, प्राण, इन्द्रिय, अग्नि, जल,भू, वायु, नभ संसार को,
सब प्राणियों के रचयिता, वंदन है रचनाकार को।
मन प्राण हीन तथापि सब कुछ कर सके वह समर्थ है,
उस आत्मभू अखिलेश के, अद्भुत महिम सामर्थ्य है॥ [ ३ ]
उस ब्रह्म का द्यु लोक मस्तक, चंद्रमा रवि नेत्र हैं,
वाणी ही विस्तृत वेड और चारों दिशाएं श्रोत्र हैं।
यह चराचर जग ह्रदय और वायु प्राण अचिन्त्य की,
हैं पग धरा, सब प्राणियों में आत्मा आद्यंत की॥ [ ४ ]
है अग्नि तत्व प्रगट विभो से, जिसकी समिधा सूर्य है,
मेघ सोम से, मेघों से औषधियां मिलती अपूर्व हैं।
सेवन से करता पुरूष वीर्य का, नारी में संचार है,
ऐसे चराचर जग के मूल में, ब्रह्म तत्व प्रसार है॥ [ ५ ]
ऋग, साम, यजुः के मन्त्र श्रुतियों, दक्षिनाएँ दीक्षा भी,
शुचि यज्ञ, ऋतु, यजमान लोका काल संवत्सर सभी।
वे लोक सब जहॉं सूर्य शशि, करते प्रकाशित तेज हैं,
अणु-कण से ले ब्रह्माण्ड तक, सब ब्रह्म के ही ओज हैं॥ [ ६ ]
परब्रह्म से ही विविध देव व् साध्य गण निष्पन्न हैं,
पशु, पक्षी, प्राण, अपान वायु व् अन्न जौ उत्पन्न हैं।
तप श्रद्धा सत्यम, यज्ञ विधि व् ब्रह्मचर्य, विधान भी,
मानव, जगत, ब्रह्माण्ड के, अणु कण चराचर प्राण भी॥ [ ७ ]
यह सप्त समिधाएं विषय रूपी व् सातों अग्नियाँ,
सात भाँति के होम, लोक व् प्राण सातों इन्द्रियाँ।
समुदाय सप्त के हृदय रूपी गुफा में जब सोते हैं,
इन सभी के मूल में परमेश तत्व ही होते हैं॥ [ ८ ]
बहु रूप नदियाँ जलधि बहते, और गिरि अतिशय महे,
सम्पूर्ण औषधियां व् रस, उत्पन्न प्रभु अद्भुत से हे !
जिस रस से पुष्ट, शरीरों में, उन प्राणियों की आत्मा,
बन उनके हृदयों में बसे, अन्तर्निहित परमात्मा॥ [ ९ ]
अति परम अमृत रूप ब्रह्म व् कर्म तप संसार के,
विश्वानि पुरषोत्तम के ही, सब रूप करुनाधार के।
हृदय रूपी गुफा स्थित ब्रह्म को, शौनक प्रिय जो जान ले,
अज्ञान- ग्रंथि को खोल वह, प्रभुवर की सत्ता मान लें॥ [ १० ]
द्वितीय मुण्डक / द्वितीय खण्ड / मुण्डकोपनिषद / मृदुल कीर्ति
प्रभु हृदय रूप गुफा में स्थित, सो गुहाचर नाम है,
ज्योतिर्स्वरूप समीप अति, अति परम पद है महान है।
सब प्राणधारी हैं प्रतिष्ठित, उस ब्रह्म में संसार के,
वरणीय अतिशय श्रेष्ठ शुचि, अज्ञेय करुनागार के॥ [ १ ]
सूक्ष्मातिसूक्ष्म जो दीप्ति मय, अविनाशी ब्रह्म महान है,
सब लोक और सब लोकवासी, ब्रह्म मय हैं प्रधान हैं।
वही ब्रह्म प्राण हैं, ब्रह्म वाणी, सत्य मन अमृत वही,
हे सौम्य !वेधन योग्य लक्ष्य में, लीन हो न भटक कहीं॥ [ २ ]
ज्यों लक्ष्य भेदन से प्रथम ,वाणों को करते तीक्ष्ण हैं,
त्यों आत्मा रूपी वाण पूजा से तीक्ष्ण हो यदि क्षीण हैं।
आराधना से तीक्ष्ण शर, धनु पर चढाये भक्ति से,
हे सौम्य खींचो लक्ष्य बेधो, ॐ भाव की चिट्टी से॥ [ ३ ]
ओंकार धनु जीवात्मा शर, ब्रह्म उसका लक्ष्य है,
ओंकार में हों प्राण लय, नहीं ब्रह्म का समकक्ष है।
बस अप्रमादी मनुज से ही बींधा जाने योग्य है,
उसे बींध कर तन्मय हो जो, वही लक्ष्य पाने योग्य है॥ [ ४ ]
यह स्वर्ग, भू, द्यौ , प्राणि, मन, अंतःकरण सब जगत के,
विश्वानि विशेश्वर मयीसे ओत प्रोत हैं महत के।
उसी एक सबके आत्म रूप, प्रभो को तुम सब जान लो,
शेष त्याग दो, ब्रह्म को ही, अमिय सेतु मान लो॥ [ ५ ]
नाभि में रथ की अरों सम, स्थित ह्रदय में नाडियाँ,
एकत्र स्थित हैं हृदय में, वास प्रभु करते वहाँ।
एक ॐ नाम के सतत चिंतन, से ही प्रभुवर साध्य है,
अज्ञान-तम से अतीव हो, तो सिन्धु भव निर्बाध है॥ [ ६ ]
प्रभु सर्व जित सर्वज्ञ, जिसकी विश्व में महिमा मही,
प्राणों का अधिनायक रुचिर, नभ रूप, नभ स्थित वही।
वही अन्नमय स्थूल तन में, प्राणियों के है यही,
जिसे ज्ञानियों ने ज्ञान से, प्रत्यक्ष कर महिमा कही॥ [ ७ ]
परब्रह्म परमेश्वर परात्पर, कार्य कारण रूप को
जो तत्व से जाने, तब ही जाने, अचिन्त्य अरूप को,
जीवात्मा की हृदय की गांठे, अविद्या की खुलें,
अथ कर्मों के बंधन कटें, जीवात्मा प्रभु से मिले॥ [ ८ ]
परब्रह्म अधिकारी विमल जो सर्वथा ही विशुद्ध है,
अवयव रहित है, अचिन्त्य, अद्भुत, जानता जो प्रबुद्ध है,
सब ज्योतियों की ज्योति, जिसको आत्म ज्ञानी जानते,
अति दिव्य ज्योति का मूल कोष, तो ब्रह्म को ही मानते॥ [ ९ ]
न तो रवि न ही चंद्र तारा और न ही बिजलियाँ,
उस स्व प्रकाशित ब्रह्म के तो समीप न ही अग्नियाँ।
होती प्रकाशित, ब्रह्म तो सब ज्योतियों का मूल है,
उससे प्रकाशित जग चराचर, सूक्ष्म है स्थूल है॥ [ १० ]
वह दाएँ, बाएँ, आगे, पीछे, उर्ध्व नीचे चहुँ दिशा,
में व्याप्त व्यापकता परम की, व्याप्त ब्रह्म है एक सा।
बहु सर्व व्यापकता प्रभो की, एक सी अणु-कण में है,
वह विश्व में ब्रह्माण्ड में, परब्रह्म तो हर क्षण में है॥ [ ११ ]
तृतीय मुण्डक / प्रथम खण्ड / मुण्डकोपनिषद / मृदुल कीर्ति
मानव शरीर को मानो जैसे, एक वृक्ष का रूप है,
जहाँ जीव ईश्वर ह्रदय नीड़ में, रहते मित्र स्वरुप हैं।
जीवात्मा खग कर्म फल के राग द्वेष से युक्त है,
परमात्मा निष्काम वृति से देखता व् मुक्त है॥ [ १ ]
जीवात्मा मोहित निमग्न है, और अति आसक्त है,
बहु शोक तापों से ग्रसित, फ़िर भी नहीं वह विरक्त है।
जो नित्य प्रिय शुचि अति सुह्रद भक्तों से सेवित ईश को,
प्रत्यक्ष जीवात्मा करे, तब पाये निश्चय ईश को॥ [ २ ]
जब ब्रह्म के भी आदि कारण, पूर्ण पुरुषोत्तम प्रभो,
जो जग रचयिता सबके शासक, आत्मभू अद्भुत विभो।
का दिव्या दर्शन, सौम्य दर्शन कर सके जीवात्मा,
हों शेष उसके पुण्य पाप व् पाये वह जीवात्मा॥ [ ३ ]
यह सर्व व्यापी ब्रह्म सबके प्राण हैं इस तथ्य को,
जो जानते मितभाषी वे, करते न व्यर्थ के कथ्य को।
इश्वर में ही प्रति पल रमण, जिसे ईशमय संसार है,
भक्त ऐसा ब्रह्म वेत्ताओं में, श्रेष्ठ अपार है॥ [ ४ ]
परब्रह्म अंतःकरण स्थित, शुचि शुभ्र ज्योतिर्मय प्रभो,
मित सत्य भाषण, ब्रह्मचर्य, व् ज्ञान तप से ही विभो।
है प्राप्त केवाल्तत्व सम्यक, ज्ञान से निर्दोष को,
बहु यत्न शील ही पा सकेंगे, सत्य ब्रह्म विशेष को॥ [ ५ ]
जय जयति शाश्वत सत्य की, होती असत्य की जय कहाँ,
यही देवपथ है सत्यमय, ऋषि पूर्ण काम गमन जहाँ।
कहते वहां सत्यस्वरूपी, ब्रह्म रहते हैं सदा।
वे सत्य मय पथ ब्रह्म तक होते प्रशस्त हैं सर्वदा॥ [ ६ ]
अन्वेषियों की ह्रदय रूप गुफा में ब्रह्म का वास है,
वह दूर से भी दूर है, अत्यन्त अतिशय पास है।
सूक्ष्म से अति सूक्ष्म रूप में, ब्रह्म दिव्य महान हैं,
आद्यंत हीन अचिन्त्य अद्भुत बृहत ब्रह्म विधान हैं॥ [ ७ ]
न तो नेत्रों से न ही वाणी से, न ही इन्द्रियों से ग्राह्य है,
तप साधना कर्मों के भी बहु बंधनों से बाह्य है।
अवयव रहित उस ब्रह्म को तो, शुद्ध अंतःकरण से,
ही पाये साधक विमल ज्ञान की शुद्ध शुद्धि करण से॥ [ ८ ]
जिसके शरीर में पाँच भेदों वाला प्राण प्रविष्ट है,
उस हृदय मध्ये सूक्ष्म जीवात्मा वही है, विशिष्ट है।
यदि हो विरत भोगादि से, निश्चय ही पायें शचीपते,
आसक्त वे जो पा सकेंगे, भोग इच्छित मन मते॥ [ ९ ]
अति शुद्ध अन्तः करण वाला व्यक्ति जिस-जिस लोक का,
चिंतन करे एकाग्र मन तो भागी हो उस भोग का।
आत्मज्ञ स्व बहुजन हिताय, कर्म करते हैं प्रिये,
अति पूज्य हों ज्ञानी उन्हें, ऐश्वर्य जिनको चाहिए॥ [ १० ]
तृतीय मुण्डक / द्वितीय खण्ड / मुण्डकोपनिषद / मृदुल कीर्ति
शुचि परम शुभ्रं ब्रह्म धाम को जानते निष्कामी ही,
सन्निहित है ब्रह्माण्ड जिसमें, है वही अविरामी ही।
निष्कामी साधक, परम की, जो करते हैं ऋत साधना,
रज वीर्य मय जन्मं मरण की शेष उसकी यातना॥ [ १ ]
वहॉं जन्म होता है सकामी का, जहॉं वह चाहता ,
महा पूर्ण काम जो हो चुका, उसे कोई कर्म न थामता।
जब कामनाएं सकल उसकी सर्वथा ही विलीन हों ,
तब त्यक्तेन का भावः मुख्य हो, ब्रह्म मैं लवलीन हो॥ [ २ ]
मिलता प्रभो नहीं बुद्धि प्रवचन, तर्क श्रुति न विवाद से
वह तो मिले केवल उसी की, ऋत कृपा के प्रसाद से।
स्वीकार जिसको स्वयं करते, स्वयं उसको ही प्रभो,
अपना यथार्थ स्वरुप दिखलाते , प्रकट होते विभो॥ [ ३ ]
कर्तव्य त्यागी और प्रमादी, साधना बलहीन को,
शुचि सात्विक लक्षण रहित, साधक व् ध्यान विहीन को।
नहीं ब्रह्म है प्राप्तव्य, वह तो मात्र पावन भक्त को,
प्राप्तव्य अभिलाषी जो उत्कट, और ऋत आसक्त को॥ [ ४ ]
वे जिनके अंतःकरण शुद्ध हों, रागहीन हों सर्वथा
ऐसे महर्षि गण ही ब्रह्म को, प्राप्त हो जाते यथा।
ऋत ज्ञान से वे तृप्त शांत व्, ब्रह्म से संयुक्त हैं,
पूर्णतः वे प्रविष्ट ब्रह्म में, ब्रह्म हेतु नियुक्त हैं॥ [ ५ ]
वेदांत ज्ञान से ब्रह्म को जो, पूर्ण रूप से जानते,
वे कर्म फल आसक्ति त्याग के, मार्ग को पहचानते।
हैं शुद्ध अंतःकरण जिनके, मरण काले वे सभी,
ब्रह्म लोक में अमर होकर जन्म न लेते कभी॥ [ ६ ]
पन्द्रह कलाएं और सारे देवता व् इन्द्रियाँ,
सब ही अपने देवताओं में, प्रतिष्ठित हों वहाँ ।
उन्मुक्त वही जीवात्मा, सब कर्म बंधन से परे,
वही ब्रह्म अविनाशी में लीन हो, जटिल भव सागर तरे॥ [ ७ ]
स्व नाम रूप को त्याग जैसे जलधि में नदियाँ मिलें,
अथ यथा ज्ञानी नाम रूप से, रहित हो प्रभु से मिलें।
वे शुद्ध परात्पर दिव्य होकर, ब्रह्म में तल्लीन हों,
फ़िर ब्रह्म मय ब्रह्मत्व ब्रह्म के अंश में लवलीन हों॥ [ ८ ]
यह तो नितांत ही सत्य है की जो भी ब्रह्म को जानता,
है निश्चय ही वह ब्रह्म, उसका कुल भी ब्रह्म को जानता।
वह शोक, चिंता, पाप भय, संशय, विषय, अभिमान से,
संशय विपर्यय हीन, मुक्त हो जन्म मृत्यु विधान से॥ [ ९ ]
हैं ब्रह्म विद्या के वही अधिकारी, जो जिज्ञासु हैं।
जो वर्ण आश्रम, धर्म पालक, ब्रह्म तत्व पिपासु हैं।
निष्कामी वे जो दक्ष, जिनकी ब्रह्म निष्ठा लक्ष्य है,
शुभ यज्ञ करता जिनको नतैतरीय उपनिषद, शान्ति मंत्र
ब्राह्मण ग्रन्थ दो प्रकार के हैं-श्रुति जिसमें वेद ब्राह्मण उपनिषद इत्यादि आते हैं और स्मृति जिसके अन्तर्गत रामायण महाभारत पुराण स्मृतियाँ आदि आती हैं। लेकिन पुरातन ब्राह्मण में ऐतरेय, शतपथ, पंचविश, तैतरीय आदि विशेष महत्वपूर्ण हैं।
मंत्र
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः ।
शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो ब्रिहस्पतिः ।
शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो ।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षम् ब्रह्म वदिष्यामि ।
ॠतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु ।
तद्वक्तारमवतु ।
अवतु माम् ।
अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
ॐ सह नाववतु |
सह नौ भुनक्तु |
सह वीर्यं करवावहै |
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ||
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता
मनो मे वाचि प्रतिष्ठित-मावीरावीर्म एधि ।
वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्
संदधाम्यृतम् वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु
तद्वक्तारमवत्ववतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः !
स्थिरैरन्ङ्गैस्तुष्टुवागं सस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितम् यदायुः !!
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो ब्रिहस्पतिर्दधातु !!
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: ,
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति: ।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: ,
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि ॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥
ॐ असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्माSमृतं गमय ।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥
स्तोत्र
विष्णु मन्त्र
ॐ नमो नारायणाय
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गं ।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिध्यार्नगम्यं
वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
ब्रहमार्पणं ब्रहमहविर्ब्रहमाग्नौ ब्रहमणा हुतम् ।
ब्रहमैव तेन गन्तव्यं ब्रहमकर्मसमाधिना ॥जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किये जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना भी ब्रह्म है --उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किये जनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है।
ॐ क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजन वल्लभाय स्वाहा ।
वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूरमर्दनं ।
देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरुं ॥
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥
महा मृत्युञ्जय मन्त्र
ओम त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिबर्धनम्
उर्वारूकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात्
॥सरस्वती स्तोत्र॥
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा माम् पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्याऽपहा||
भावार्थ: शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत्में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार स्वरूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से अभयदान देने वाली, अज्ञान के अँधेरे को दूर करने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली एवं पद्मासन पर विराजमान बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हू।
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमा माद्या जगद्व्यापिनीं।
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् ॥१॥
हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां।
वंदे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥२॥
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् ॥१॥
हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां।
वंदे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥२॥
भावार्थ: शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत्में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार स्वरूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से अभयदान देने वाली, अज्ञान के अँधेरे को दूर करने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली एवं पद्मासन पर विराजमान बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हू।
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शिव महिमा स्तोत्र
महिम्नः पारं ते, परमविदुषो यज्ञसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीना मपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामधि गृणन्
ममाप्येषः स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥१॥
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाड् मनसयो
रतद्व्यावृत्यायं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥२॥
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत
स्तव ब्रह्मन्किं वा गपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥३॥
तवैश्चर्यें यत्तद् जगदुदयरक्षाप्रलयकृत
त्रयी वस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहंतुं व्योक्रोशीं विदधत इहै के जडधियः ॥४॥
किमिहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।
अतकर्यैश्वर्येत्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः
कुतर्कोडयंकांश्चि न्मुखरयति मोहाय जगतः ॥५॥
अजन्मानो लोकाः किमवयवंवतोडपि जगता
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादत्य भवति ।
अनीशो वा कुर्याद भुवनजनने कः परिकरो
यतो मंदास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥६॥
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्या दजुकुटिलनानापथजुषां
नृणामेको गम्य स्त्वमसि पयमामर्णव इव ॥७॥
महोक्षः खड्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीय त्तव वरद तंत्रोपकरणम् ।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भव द्भ्रूप्रणिहितां
नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥८॥
ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध्रुवमिदं
परो ध्रोव्याध्रोव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्तेडप्येतस्मि न्पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवंजिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥९॥
तवैश्वर्यं यत्ना द्यदुपरि विरिंचिर्हरिरधः
परिच्छेतुं याता वनलमनलस्कंधवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धा भरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिने फलति ॥१०॥
अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहू नभृन रणकंडुपरवशान् ।
शिरःपद्मश्रेणी रचितचरणांभोरुहबलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्ते स्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥११॥
अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनं
बलात्कैलासेडपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः ।
अलभ्यापाताले डप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा प्रत्वय्या सीद्ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ॥१२॥
यदद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती
मधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयस्त्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिंन्वरिवसितरि त्वच्चरणयो
र्न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥१३॥
अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा
विधेयस्यासीद्यस्त्रिनयविषं संह्रतवतः ।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोडपि श्लाध्यो भुवनभयभंगव्यसनिनः ॥१४॥
असिद्धार्था नैव कवचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।
स पश्यन्नीश त्वामितरसरुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा नहि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥१५॥
मही पादाधाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् ।
मुहुद्यौंर्दोस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥१६॥
वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदष्टः शिरसि ते ।
जगद् द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि
त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥१७॥
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाडगे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति ।
दिधक्षोस्ते कोडयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधिर्
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥१८॥
हरिस्ते साहस्त्रं कमलबलिमाधाय पदयो
यदिकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भकत्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥१९॥
क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दटपरिकरः कर्मसु जनः ॥२०॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता
मृषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।
क्रतुभ्रंषस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥२१॥
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतंममुं
त्रसन्तं तेडद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥
स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दष्टवा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत देहार्धघटना
दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥२३॥
स्मशानेष्वाक्रीडा स्महर पिशाचाः सहचरा
श्चिताभस्मालेपः स्तगपि नृकरोटीपरिकरः ।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथाडपि स्मर्तृणां वरद परमं मंगलमसि ॥२४॥
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः
प्रह्रष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्संगितदशः ।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये
दद्यत्यंतस्तत्त्वं क्रिमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥२५॥
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह
स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयिपरिणता बिभ्रतु गिरं
न विद्मस्तत्तत्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥२६॥
त्रयीं तिस्त्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा
नकाराद्यैर्वर्णै स्त्रिभिरभिदधत्तीर्ण विकृतिः ।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥२७॥
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहां
स्तथां भीमशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रवितरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मै धाम्ने प्रणिहितनमस्योडस्मि भवते ॥२८॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदवदविष्ठाय च नमो
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ।
नमोवर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठा च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमितिशर्वाय च नमः ॥२९॥
बहलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः ।
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥३०॥
कृशपरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुणसीमोल्लंधिनी शश्वद्रद्धिः
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ॥३१॥
असितगिरिसमंस्यात् कज्जलं सिंधुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखिनी पत्रमुर्वि ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणाना मीश पारं न याति
असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौले
र्ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य ।
सकलगणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो
रुचिरमलधुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार ॥३३॥
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाडत्र
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥३४॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मंत्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥३५॥
ीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥३६॥
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः
शिशुशशिधरमौलेर्देव देवस्य दासः ।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥३७॥
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्रांजलिर्नान्यचेताः ।
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥३८॥
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गंधर्वभाषितम् ।
अनौपम्यं मनोहारिशिवमीश्वरवर्णनम् ॥३९॥
इत्येषा वाडमयी पूजा श्रीमच्छंकरपादयोः ।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥४०॥
तव तत्त्वं न जानामि कीद्शोडसि महेश्वर ।
याद्सोडसि महादेव ताद्शाय नमो नमः ॥४१॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥४२॥
श्री पुष्पदंतमुखपंकजनिर्गतेन
स्तोत्रेंण किल्बिहरेण हरप्रियेण ।
कंठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥४३॥
स्तुतिर्ब्रह्मादीना मपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामधि गृणन्
ममाप्येषः स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥१॥
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाड् मनसयो
रतद्व्यावृत्यायं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥२॥
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत
स्तव ब्रह्मन्किं वा गपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥३॥
तवैश्चर्यें यत्तद् जगदुदयरक्षाप्रलयकृत
त्रयी वस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु ।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहंतुं व्योक्रोशीं विदधत इहै के जडधियः ॥४॥
किमिहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।
अतकर्यैश्वर्येत्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः
कुतर्कोडयंकांश्चि न्मुखरयति मोहाय जगतः ॥५॥
अजन्मानो लोकाः किमवयवंवतोडपि जगता
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादत्य भवति ।
अनीशो वा कुर्याद भुवनजनने कः परिकरो
यतो मंदास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥६॥
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्या दजुकुटिलनानापथजुषां
नृणामेको गम्य स्त्वमसि पयमामर्णव इव ॥७॥
महोक्षः खड्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीय त्तव वरद तंत्रोपकरणम् ।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भव द्भ्रूप्रणिहितां
नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥८॥
ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध्रुवमिदं
परो ध्रोव्याध्रोव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्तेडप्येतस्मि न्पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवंजिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥९॥
तवैश्वर्यं यत्ना द्यदुपरि विरिंचिर्हरिरधः
परिच्छेतुं याता वनलमनलस्कंधवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धा भरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिने फलति ॥१०॥
अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहू नभृन रणकंडुपरवशान् ।
शिरःपद्मश्रेणी रचितचरणांभोरुहबलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्ते स्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥११॥
अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनं
बलात्कैलासेडपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः ।
अलभ्यापाताले डप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा प्रत्वय्या सीद्ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ॥१२॥
यदद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती
मधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयस्त्रिभुवनः ।
न तच्चित्रं तस्मिंन्वरिवसितरि त्वच्चरणयो
र्न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥१३॥
अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा
विधेयस्यासीद्यस्त्रिनयविषं संह्रतवतः ।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोडपि श्लाध्यो भुवनभयभंगव्यसनिनः ॥१४॥
असिद्धार्था नैव कवचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।
स पश्यन्नीश त्वामितरसरुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा नहि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥१५॥
मही पादाधाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् ।
मुहुद्यौंर्दोस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥१६॥
वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदष्टः शिरसि ते ।
जगद् द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि
त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥१७॥
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाडगे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति ।
दिधक्षोस्ते कोडयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधिर्
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥१८॥
हरिस्ते साहस्त्रं कमलबलिमाधाय पदयो
यदिकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भकत्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥१९॥
क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दटपरिकरः कर्मसु जनः ॥२०॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता
मृषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।
क्रतुभ्रंषस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥२१॥
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतंममुं
त्रसन्तं तेडद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥
स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दष्टवा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत देहार्धघटना
दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥२३॥
स्मशानेष्वाक्रीडा स्महर पिशाचाः सहचरा
श्चिताभस्मालेपः स्तगपि नृकरोटीपरिकरः ।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथाडपि स्मर्तृणां वरद परमं मंगलमसि ॥२४॥
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः
प्रह्रष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्संगितदशः ।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये
दद्यत्यंतस्तत्त्वं क्रिमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥२५॥
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह
स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयिपरिणता बिभ्रतु गिरं
न विद्मस्तत्तत्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥२६॥
त्रयीं तिस्त्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा
नकाराद्यैर्वर्णै स्त्रिभिरभिदधत्तीर्ण विकृतिः ।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥२७॥
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहां
स्तथां भीमशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।
अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रवितरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मै धाम्ने प्रणिहितनमस्योडस्मि भवते ॥२८॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदवदविष्ठाय च नमो
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ।
नमोवर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठा च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमितिशर्वाय च नमः ॥२९॥
बहलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः ।
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥३०॥
कृशपरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुणसीमोल्लंधिनी शश्वद्रद्धिः
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम् ॥३१॥
असितगिरिसमंस्यात् कज्जलं सिंधुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखिनी पत्रमुर्वि ।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणाना मीश पारं न याति
असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौले
र्ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य ।
सकलगणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो
रुचिरमलधुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार ॥३३॥
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाडत्र
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥३४॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मंत्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥३५॥
ीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः ।
महिम्नस्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥३६॥
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः
शिशुशशिधरमौलेर्देव देवस्य दासः ।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥३७॥
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्रांजलिर्नान्यचेताः ।
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥३८॥
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गंधर्वभाषितम् ।
अनौपम्यं मनोहारिशिवमीश्वरवर्णनम् ॥३९॥
इत्येषा वाडमयी पूजा श्रीमच्छंकरपादयोः ।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥४०॥
तव तत्त्वं न जानामि कीद्शोडसि महेश्वर ।
याद्सोडसि महादेव ताद्शाय नमो नमः ॥४१॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥४२॥
श्री पुष्पदंतमुखपंकजनिर्गतेन
स्तोत्रेंण किल्बिहरेण हरप्रियेण ।
कंठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥४३॥
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हनुमानजी का चरित्र पूर्ण समर्पण का जीता जागता उदाहरण है। समर्पण की पराकाष्ठा है हनुमानजी के जीवन में। पर महानता की भी पराकाष्ठा है हनुमानजी की। हनुमानजी जैसे तो हनुमानजी ही हुए है।पूर्ण समर्पण के बाद एक महान शक्ति का आन्तरिक विस्फोट होता है और वह शक्ति व्यक्ति को पराक्रमपूर्ण कर्म की ओर प्रेरित करती है। जहां उद्देश्य के प्रति समर्पण हुआ, वहां प्रचण्ड पराक्रम का तुफान चल पड़ता है।
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